This movement is not of land, it is a question of conscience ‘, if we do not come, what would we show to the generations to come? | किसानों का साथ देने पहुंचे युवा बोले- ये जमीर का सवाल है, नहीं आते तो पीढ़ियों को क्या मुंह दिखाते?

0
14


  • Hindi News
  • Db original
  • This Movement Is Not Of Land, It Is A Question Of Conscience ‘, If We Do Not Come, What Would We Show To The Generations To Come?

Ads से है परेशान? बिना Ads खबरों के लिए इनस्टॉल करें दैनिक भास्कर ऐप

नई दिल्ली18 मिनट पहलेलेखक: राहुल कोटियाल

  • कॉपी लिंक

कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन 7 दिन से जारी है। कई राज्यों के छात्र और युवा किसानों का साथ देने पहुंच रहे हैं।

  • किसानों को देश के कई हिस्सों से यहां पहुंचे युवाओं का समर्थन मिल रहा है, इनमें कई छात्र हैं तो कई बिजनेस करने वाले भी हैं
  • वे कहते हैं कि हम अपने बुजुर्गों के आगे खड़े होंगे, ताकि कोई भी लाठी चले तो वो पहले हमारे शरीर पर पड़े

23 साल की पूजा श्रीवास मध्य प्रदेश की रहने वाली हैं। वे ग्वालियर के केआरजी कॉलेज से पॉलिटिकल साइंस में एमए कर रही हैं। इन दिनों पूजा अपने घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर दिल्ली हरियाणा बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन में साथ देने पहुंची हैं। किसानों के मंच से जब वे पूरे जोश में इंकलाब का नारा उछालती हैं तो किसान भी पूरे जोश से उनका समर्थन करते हैं और सैकड़ों तनी हुई मुट्ठियां हवा में उठ जाती हैं।

पूजा कहती हैं, ‘ये सिर्फ किसानों का आंदोलन नहीं, बल्कि पूरे देश का आंदोलन है। किसान जिन मांगों के लिए आंदोलन कर रहे हैं वो मुद्दे सभी को प्रभावित करते हैं। खेती-किसानी अगर कॉरपोरेट के हाथों में जाती है तो हर तबके पर इसका असर पड़ेगा। इसीलिए हम लोग सड़कों पर हैं और छात्र आंदोलन का तो इस देश में लंबा इतिहास रहा है। किसी भी बड़े आंदोलन को देख लीजिए, छात्रों ने उसमें अहम भूमिका निभाई है। अपनी वही भूमिका निभाने हम लोग भी यहां आए हैं।’

पूजा अकेली नहीं हैं जो किसी दूसरे राज्य से चलकर किसानों के आंदोलन में शामिल होने दिल्ली पहुंची हैं। उनके साथ ही मध्य प्रदेश से बीस दूसरे छात्र भी यहां पहुंचे हैं, जो 22 नवंबर से ही इस आंदोलन में शामिल होने अपने-अपने घरों से निकल पड़े थे। उनके अलावा देश के कई दूसरे राज्यों से भी ऐसे युवा आंदोलन में शामिल होने पहुंचे हैं जो खुद भले ही किसानी नहीं करते, लेकिन किसानों की मांगों का पूरा समर्थन कर रहे हैं। पंजाब के रहने वाले हरमन ढिल्लो भी ऐसे ही एक युवा हैं जो चंडीगढ़ से किसान आंदोलन में शामिल होने दिल्ली आए हैं।

दिल्ली से आए भगत सिंह छात्र एकता मंच के युवा। ये किसानों के लिए पोस्टर बनाने का काम कर रहे हैं।

दिल्ली से आए भगत सिंह छात्र एकता मंच के युवा। ये किसानों के लिए पोस्टर बनाने का काम कर रहे हैं।

हरमन मूल रूप से पंजाब के फाजिल्का जिले के रहने वाले हैं। बीटेक की पढ़ाई कर चुके हरमन पंजाबी म्यूजिक और फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं और बॉलीवुड की कुछ फिल्मों में भी काम कर चुके हैं। अक्षय कुमार की चर्चित फिल्म केसरी में उन्होंने जीवन जलंधरी की भूमिका निभाई थी जो 21 सिख सैनिकों में से एक था। हरमन बताते हैं,‘जब ये आंदोलन शुरू हुआ तो हमें इसका अंदाजा नहीं था कि ये इतना बड़ा होने जा रहा है। हम अपने काम में ही व्यस्त थे। लेकिन, फिर एक दिन हमने इंस्टाग्राम में इस आंदोलन का एक वीडियो देखा जिसमें एक बुजुर्ग महिला बता रही थी कि उसका कोई बेटा नहीं है और वो कितनी कठिनाई से दिल्ली तक पहुंची है। उसकी बात ने हमें झकझोर कर रख दिया। वो महिला हमारी मां जैसी है और इस उम्र में भी आंदोलन में आई है। हम उसके बेटे बनकर ही यहां पहुंचे है।’

हरमन के साथ ही 26 साल के अमरिंदर गिल भी चंडीगढ़ से इस आंदोलन में शामिल होने पहुंचे हैं। वे कहते हैं,‘हमने जब देखा कि हमारे बुजुर्गों पर लाठियां चलाई जा रही हैं, उन पर पानी की बौछार मारी जा रही है और वे कड़कड़ाती ठंड में सड़कों पर बैठने को मजबूर कर दिए गए हैं तो हमारा खून खौल गया। उसी दिन हमने तय किया कि हम दिल्ली जाएंगे और अपने बुजुर्गों के आगे खड़े होंगे, ताकि कोई भी लाठी चले तो वो हमारे शरीर पर पड़े। लेकिन, अपने बुजुर्गों पर हम लाठी नहीं चलने देंगे।’

अमरिंदर आगे कहते हैं, ‘हमें कुछ देर से ही सही, लेकिन ये समझ आया कि यह सिर्फ जमीन का आंदोलन नहीं बल्कि जमीर का आंदोलन है। हम इसमें शामिल नहीं होते तो आने वाली नस्लों को क्या मुंह दिखाते। आने वाले समय में जब बच्चे हमसे सवाल करते कि जब किसान दिल्ली में इतना बड़ा आंदोलन कर रहे थे तो हम कहां थे, इस सवाल का हम क्या जवाब देते। कई लोग हमसे पूछते हैं कि क्या आप भी किसान हो जो इस आंदोलन में आए हो। हम जवाब देते हैं कि यहां आने के लिए हमारा किसान होना जरूरी नहीं, अगर हमने सिर पर पगड़ी पहनी है तो वही काफी है।

हरमन और अमरिंदर। हरमन मूल रूप से पंजाब के फाजिल्का जिले के रहने वाले हैं और बॉलीवुड की कुछ फिल्मों में काम कर चुके हैं।

हरमन और अमरिंदर। हरमन मूल रूप से पंजाब के फाजिल्का जिले के रहने वाले हैं और बॉलीवुड की कुछ फिल्मों में काम कर चुके हैं।

अगर हमारी नसों में पंजाब का खून है तो यही इस आंदोलन में शामिल होने के लिए काफी है। अमरिंदर और हरमन की ही तरह देश के कई राज्यों से ऐसे युवा इस आंदोलन में पहुंचे हैं जो भले ही खुद खेती-किसानी नहीं करते, लेकिन किसानों के आंदोलन में पूरी सक्रियता से हिस्सा ले रहे हैं। इनमें हरियाणा से आए पंकज और उनके साथी भी हैं। जो कई दिनों से लंगर में सेवा करते हुए कभी सब्जियां काट रहे हैं तो कभी आटा गूंथ रहे हैं। फतहगढ़ साहेब से आए दलजीत सिंह और उनके साथी भी हैं, जो लोगों को मुफ्त दवाएं बांट रहे हैं।

दिल्ली यूनिवर्सिटी के भी कई छात्र इस आंदोलन में पहुंचे हैं और पोस्टर-बैनर लगाने से लेकर नुक्कड़ नाटक करने, जन-गीत गाने, किसानों के लिए बिस्तर का इंतजाम करने से लेकर रोज फैलने वाले कूड़े को साफ करने तक का काम कर रहे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी की लॉ फैकल्टी में पढ़ने वाले रविंदर सिंह कहते हैं, ‘हम लोग चार दिनों से यहां हैं और सिर्फ किसानों के लिए नहीं बल्कि अपने और अपने भविष्य को बचाने के लिए भी यहां हैं। इस सरकार में सिर्फ यही एक कानून ऐसा नहीं आया है जो जनता के खिलाफ है, बल्कि नई शिक्षा नीति से लेकर लेबर कानून तक कई जन-विरोधी कानून आ चुके हैं।

‘रेलवे से लेकर तमाम चीजों का जिस तरह से निजीकरण हो रहा है, ये आम लोगों पर हमला है। दिनों दिन सिर्फ कॉरपोरेट को मजबूत किया जा रहा है और खेती से लेकर सभी संसाधन उनके हवाले किए जा रहे हैं। आम आदमी लगातार कमजोर हो रहा है। अगर हम और हमारी आने वाली पीढ़ियां इस सब के बीच बर्बाद नहीं होना चाहते तो हमें आज खड़े होकर लड़ना ही होगा। अगर हम आज पीछे हट गए तो सारी उम्र इसका खामियाजा भुगतना होगा। इसीलिए आज ये लड़ाई बहुत जरूरी है और यही लड़ाई लड़ने हम यहां आए हैं।’

कई राज्यों से आए युवा यहां किसानों के लिए काम कर रहे हैं। वे मुफ्त दवाएं बांट रहे हैं।

कई राज्यों से आए युवा यहां किसानों के लिए काम कर रहे हैं। वे मुफ्त दवाएं बांट रहे हैं।

हरियाणा के कई जिलोंं से कुश्ती और पहलवानी करने वाले युवा भी यहां आए हैं। इनमें कई तो ऐसे हैं जिन्होंने प्रदर्शन स्थल के पास ही एक जिम भी जॉइन कर ली है, ताकि दिन भर वे आंदोलन में हिस्सा ले सकें और शाम को जिम जाकर कसरत भी जारी रख सकें। इनमें कई युवा ऐसे भी हैं जो खुद भले ही किसानी नहीं करते, लेकिन उनके परिवार के लोग खेती-किसानी से सीधे तौर से जुड़े हुए हैं।

ऐसे ही एक युवा जसविंदर सिंह कहते हैं, ‘हम आज भले ही दूसरे व्यवसाय में अपना भाग्य आजमा रहे हों, लेकिन निकले तो हम भी खेती-किसानी वाली मिट्टी से ही हैं। जड़ें तो हमारी भी वही हैं और ये कानून उन जड़ों को काटने जैसे हैं। ऐसा होते हुए हम कैसे देख सकते हैं। इसलिए यहां आए हैं, क्योंकि हम पैदा भी इसी मिट्टी से हुए हैं और वापस इसी मिट्टी में मिलना है, इसी मिट्टी को बचाने की लड़ाई हम लड़ रहे हैं।’

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here