कोरोना रोक रहा है आधी आबादी के बढ़ते कदम– News18 Hindi

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“जहां से चले थे वहीं हैं खड़े,जिंदगी के हादसे कुछ छोटे, कुछ बड़े”  कोरोना काल में महिलाओं पर यह बात बिल्कुल सही बैठती है. वैसे तो घर और बाहर सब महिलाएं एक साथ संभालती रही हैं, लेकिन इस महामारी ने उनकी दशकों की समाज में बराबरी हासिल करने की मेहनत पर पानी फेरने की तैयारी कर ली है. इसने महिलाओं को जेंडर इनइक्वालिटी (Gender inequality) में 25 साल पीछे ले जाने की तैयारी कर डाली है. यह हम नहीं यूएन वुमन (UN WOMEN) की नई वर्ल्ड रिपोर्ट कह रही है. यूएन वुमन के इस सर्वे ने निम्न और मध्यम आय वाले 38 देशों पर फोकस किया था, कामोबेश औद्योगिक देशों के आंकड़े भी यही तस्वीर दिखाते हैं. महामारी की वजह से महिलाएं परिवार की देखभाल और घरेलू कामों में अधिक वक्त दे रही हैं. इसका प्रभाव दशकों की मेहनत पर एक साल में बर्बाद होने जैसा है. ऐसे ही कुछ खतरे जिनका आधी आबादी को सामना करना पड़ सकता है हम यहां बताने जा रहे हैं.

मानसिक और शारीरिक सेहत खराब होने का खतराः

घर में ही रहने की वजह से इस दौर में महिलाओं को परिवार की देखभाल और घरेलू कामों में सबसे अधिक वक्त बिताना पड़ रहा है. इससे उनकी मानसिक और शारीरिक सेहत को नुकसान पहुंचने का खतरा नहीं है, बल्कि दशकों की लड़ाई लड़कर जेंडर इनइक्वालिटी (Gender inequality) का जो स्टेट्स उन्होंने बनाया है, उसको खतरा है. उसमें भी 25 साल पीछे वाली स्थिति आने की पुरजोर संभावना है. यूएन वुमन की डिप्टी एक्ज़िक्यूटिव अनीता भाटिया के मुताबिक, इस समय महिलाओं पर देखभाल का भार बढ़ने की वजह से साल 1950 की लैंगिक रूढ़ियों पर लौटने का खतरा बढ़ गया है.

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रोजगार के अवसरों को जानना

इस दौरान रोजगार और शिक्षा के अवसरों से भी हाथ धोना पड़ा है और यह सिलसिला जारी है. रिपोर्ट बताती है कि इस महामारी के दौर में महिलाओं के बगैर पैसे के काम में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है. महामारी से पहले यह कयास लगाया गया था कि पूरी दुनिया में 16 अरब घंटे के अनपेड (Unpaid) कामों में से  तीन चौथाई काम आधी आबादी के जिम्मे था. मतलब यदि पुरुष एक घंटे का अनपेड काम कर रहा था उसकी तुलना में महिलाएं यही काम तीन घंटे कर रहीं थी. जब पहले ही एक पुरुष और महिला के अनपेड वर्क के बीच इतना फासला था तो महामारी के दौरान अनपेड काम के वक्त दोगुना होने में कोई शक नहीं है. यूएन वुमन के मुताबिक सबसे दुखद है कि परिवार की देखभाल की जिम्मेदारी अधिक होने की वजह से अधिकतर महिलाएं अब काम पर वापस ही नहीं लौट रही हैं.

विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की हाल इसमें बदतर है. यहां 70 फीसदी महिलाएं असंगठित क्षेत्रों में काम करती हैं जहां उनके पास नौकरियां बचा रखने के बेहद कम ऑप्शन हैं. भारत को ही लें, यहां गांवों से आने वाली औरतें महानगरों में रोजाना या मंथली सैलरी पर काम करती हैं और अक्सर इनके एम्पलॉयर (Employer) और इनके बीच किसी भी तरह का रजिस्ट्रेशन या कानूनी करार नहीं होता. इनके पास बचत भी कोई खास नहीं होती. ऐसे में बगैर काम के शहरों में गुजारा इनके लिए मुश्किल होता है.

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अनपेड वर्क महिलाओं को करता है पीछेः 

मथुरा में रहने वाली बबीता कहती हैं कि उनका टिफिन का काम है, लेकिन जब से कोरोना आया तब से बहुत परेशानी होती है. अब सब लोग घर में ही रहते हैं, मेड आती नहीं, घर का सारा काम खुद करना पड़ता है खुद के लिए वक्त नहीं मिलता. पूना से फरीदाबाद घर पर रहकर काम कर रही छुटकी कहती हैं कि घर आने के बाद घर का काम भी हो ही जाता है, लेकिन यह केवल अनपेड वर्क की तरह है इसे कोई अहमियत नहीं मिलती. यूएन की रिपोर्ट भी कुछ यही कहती है कि औरतों के घरेलू कामों की कभी सराहना नहीं होती और इसे हमेशा इस तरह देखा जाता है जिसकी कोई अहमियत ही नहीं है क्योंकि उसके लिए कोई पैसा नहीं देना पड़ता.

यह असल में दुनिया के लिए एक सामाजिक सुरक्षा की तरह है. यह परिवार के अन्य सदस्यों को काम के भार से मुक्त रखता है और उन्हें बाहर जाकर नौकरी करने के अवसर देता है, लेकिन महिलाओं के लिए ख़ुद के आगे बढ़ने और रोज़गार पाने के मौकों में बाधा बनता है. ऐसी महिलाएं आर्थिक रूप से असुरक्षित हो जाती हैं. हालांकि ये सिर्फ़ अधिकारों का सवाल नहीं है. इसका मतलब महिलाओं के अर्थव्यवस्था में भाग लेने से भी है. यूएन वुमन चेताता है कि इससे कामकाजी औरतों के की सेहत पर ही नहीं बल्कि आर्थिक प्रगति और आजादी पर भी असर पड़ेगा. (Disclaimer:इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.



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