कुछ देर चमकता रहा पानी, अन्तत: उसे उड़ा दिया धूप ने | – News in Hindi

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मंगलेश डबराल नहीं रहे. यह खबर सोशल मीडिया पर जैसे ही दिखी, मन में उनकी एक कविता की पंक्तियां उभार लेने लगीं.

यहां बचपन में गिरी थी बर्फ़
पहाड़ पेड़ आंगन सीढ़ियों पर
उन पर चलते हुए हम रोज़ एक रास्ता बनाते थे

बाद में जब मैं बड़ा हुआ
देखा बर्फ़ को पिघलते हुए
कुछ देर चमकता रहा पानी अन्तत: उसे उड़ा दिया धूप ने

खबरें लगातार आ रही थी कि मंगलेश डबराल कोरोना से ग्रसित होकर अस्पताल में हैं. पर, साथ ही उम्मीदों की चमकवाली सूचनाएं भी मिल रही थी कि वह उबर जाएंगे. वह जल्द से ठीक होकर हमारे बीच होंगे. पर, उम्मीदों की चमक खत्म हो गयी. बर्फ की तरह चमक धीरे—धीरे ही खत्म हुई.
मंगलेशजी को याद करते हुए उनकी रचनाओं के समानांतर ही उनसे हुई एक लंबी मुलाकात की याद आती है. कोई डेढ़ दशक पहले. रांची में. एक भरी दुपहरी का पूरा समय उनके साथ गुजरा था. गया तो था उनसे इंटरव्यू करने. वह हुआ भी. लेकिन, उसके बाद किसी शिक्षक अभिभावक की तरह साहित्य—कविता की दुनिया, मर्म को सहज—सरल तरीके से समझाने लगे. एकदम से उस अंदाज में, जैसे हमारे—आपके, गांव—घर के लोग सहज तरीके से रोजमर्रा के जीवन में अनेक पाठ पढ़ाते हैं. अनेक बातें कहीं उन्होंने. उसमें एक बात हमेशा के लिए मन में बैठ गयी. उन्होंने कहा था कि कवि की पहली शर्त है कि वह मन—मिजाज से स्त्रीत्व गुणवाला हो. स्त्रीत्व का गुण और भाव आ जाने से सब कुछ स्वत: आ जाता है. जमीनी समझ, लोक की समझ, उसे बरतने की क्षमता, संघर्ष करने की क्षमता, अहंकार से परे हो जाने का गुण और सुंदरतम—सरोकारी रूप में नया सृजित करने की क्षमता,… सब. और इस स्त्रीत्ववाले प्रसंग को विस्तार से समझाने के बाद आखिरी में कहा था— मैं स्त्री होना चाहता हूं.

वह बहुत सहज—सरल तरीके से इतनी गंभीर बात समझा दिये थे. लेकिन, यह बात तब समझ में उतनी नहीं आयी थी. बाद में एक—एक कर जब अनेक कवियों से, साहित्यकारों से मिलना—जुलना हुआ तो उनके कहे का मर्म समझ आता गया. व सिर्फ कहते भर नहीं थे कि स्त्री होना चाहता हूं, बल्कि उनके रचनाकर्म और रचनाधर्म को देखें तो यह साफ दिखेगा भी कि वह स्त्री की तरह ही धैर्य रखकर, सृजनरत रहें. उत्तराखंड के गढ़वाल इलाके से आये. एक छोटे से गांव काफलपानी से. पर, अपनी जिज्ञासा से उन्होंने देश को जाना समझा. अपने कर्म से वह देश के शीर्षस्थ हिंदी कवि बन गये.’पहाड़ पर लालटेन’, ‘घर का रास्ता’, ‘हम जो देखते हैं’, ‘आवाज भी एक जगह है’ और ‘नये युग में शत्रु’. उनके ये पांचों संग्रह हिंदी कविता जगत में क्लासिक की श्रेणी में शामिल हो चुके हैं. विषय की विविधता, भाषा की सहजता और व्यापक सरोकार की वजह से. वह जाने गये कवि रूप में लेकिन गद्य लेखन में भी उनकी अलग छाप रही. उनके दो गद्य संग्रह ‘लेखक की रोटी’ और ‘कवि का अकेलापन’ अपने तरीके का अनूठा लेखन है. और यात्रावृत्तांत ‘एक बार आयोवा’ को तो क्लासिक ट्रेवलॉग का दर्जा हासिल ही है.

लेकिन मंगलेश डबराल की पहचान सिर्फ कविता और साहित्य लेखन की दुनिया तक सीमित नहीं थी. सृजन की दुनिया में उनकी पहचान की तीन रेखाएं एक साथ, समानांतर रूप से बनीं और आखिरी समय तक चलती भी रही. उन्होंने पत्रकारिता में अलग पहचान बनायी.

आमतौर पर साहित्यकार जब पत्रकार होते हैं तो वह साहित्यिक पत्रकारिता की वजह से जाने जाते हैं. पर मंगलेश डबराल की पत्रकारिता का आयाम अपार विस्तार लिए हुए रहा. वह साहित्य को राज,समाज, अर्थ,संस्कृति से जोड़ते थे. वह अपनी पत्रकारिता में हाशिये की आवाज का सामंजस्य दुनिया की बुलंद आवाज से बिठाते थे. चाहे वह हिंदी पैट्रियट के साथ पत्रकारिता कर रहे थे तब, या फिर प्रतिपक्ष और आसपास जैसी पत्रिकाओं के लिए पत्रकारिता कर रहे थे तब. बाद में जनसत्ता और सहारा समय से जुड़ने के बाद भी यह और व्यापक रूप में दिखा.

पत्रकारिता को साहित्य को जोड़ना, साहित्य को समाज से जोड़ना, हाशिये के समाज को दुनिया की शीर्ष आवाज से जोड़ना, उसे रचनाओं के माध्यम से सामने लाना उनकी कोई लेखकीय कलाबाजी भर नहीं थी, बल्कि उनका ज्ञान,अध्ययन इतना व्यापक था कि वह ऐसा करने में सक्षम थे. दुनिया के साहित्य, क्लासिक विश्व साहित्य की खिड़की हिंदी समाज के लिए खोलने में जिन चंद साहित्यकारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, उनमें मंगलेश डबराल एक महत्वपूर्ण नाम रहे. इन सबसे बड़ी बात यह रही कि वह हमेशा एक समान सक्रिय रहे. 1975 मेंं जिस ओज से वह कविता लिख रहे थे, वही ओज उम्र के सातवें दशक में भी दिखता था.

उनके चाहनेवाले लगातार उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं. स्वाभाविक है. मंगलेश डबराल हिंदी के एक स्तंभ थे. उनके असामयिक निधन से दुख का दरिया बहना स्वाभाविक है. लेकिन सच यह भी है कि कोरोना ने मंगलेश डबराल का सिर्फ उनका देह छोड़वाया है. आनेवाले समय में, जैसै—जैसे समय बीतता जाएगा, मंगलेश और जीवंत होते जाएंगे. जब—जब साहित्य को असल प्रगतिशील दृष्टि की जरूरत पड़ेगी मंगलेश याद आयेंगे. जब—जब साहित्य को सामाजिक सरोकार से मजबूती से जोड़ने की बात होगी, मंगलेश की रचनाएं सामने होंगी. (ये लेखक के निजी विचार हैं)

ब्लॉगर के बारे में

निराला बिदेसियापत्रकार और लेखक

बिहार-झारखण्ड और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में घुमक्कड़ी कर कई संस्थानों संग पत्रकारिता करने के बाद फिलहाल स्वतन्त्र लेखन और भोजपुरी- पुरबिया लोकसंस्कृति को समझने की समझ बढाने के लिए घुमक्कड़ी

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